पढ़ने से क्या
मिलता है ?
इंसान की कल्पना करने की शक्ति अद्भुत है। कल्पना कर पाने का ही परिणाम है कि यह दुनिया जैसी आज दिख रही है वैसी है। बच्चों को यह कल्पना शक्ति सहज ही मिली होती है, परंतु टीवी और मोबाइल ने कल्पना की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी है क्योंकि इनमें सबकुछ बना बनाया आंखों के सामने होता है और दिमाग़ उसी में खोया रहता है। इस माहौल में बच्चों को कल्पनालोक की सैर कराने का एक महत्वपूर्ण तरीका पढ़ने का माहौल बनाना है।
कहानियां पढ़ते हुए बच्चे के मन में चित्र बनते हैं। अच्छे साहित्य में कल्पनाशीलता और सौंदर्यात्मकता के गुण होते हैं। वह बच्चों को उनकी जिंदगियों से जुड़ी कहानियों, विचारों और मुद्दों से अवगत कराता है। किताबें पढ़ते हुए बच्चे तर्क के साथ बात करना सीखते हैं। पुस्तकों का संसार उन्हें अनदेखी दुनिया से रूबरू होने की सुविधा देता है।
तकनीकी कारण...
पढ़ना बच्चे के मस्तिष्क के बाएं हिस्से को जाग्रत करता है। विज्ञान और गणित से संबंधित जो कार्य तार्किक रूप से किए जाने चाहिए, उनको करने में यह हिस्सा मदद करता है। हर रोज भले ही केवल एक कहानी पढ़ी जाए, लेकिन यह बच्चे के स्वस्थ मस्तिष्क और भाषायी विकास को सुनिश्चित कर सकती है। सिर्फ़ यह पता करना होगा कि बच्चे की क्या पढ़ने में रुचि है।
क्या पढ़ा जाना चाहिए?
आमतौर पर साहित्य के दो बड़े विभाजन होते हैं। एक है कथा साहित्य यानी फिक्शन और दूसरा है ग़ैर कथा साहित्य यानी नॉन फिक्शन। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक इत्यादि फिक्शन हैं। इसी तरह से यात्रा वृत्तांत, जीवनी, आत्मकथा, डायरी इत्यादि नॉन फिक्शन हैं। इन सब विधाओं में साहित्य बच्चों के आयुवर्गों के हिसाब से उपलब्ध है। मसलन, प्रेमचंद की जो चर्चित कहानियां आठ-दस पन्नों की हैं, उनके संक्षिप्त बाल-संस्करण भी मिल जाएँगे।
छोटे बच्चों को चित्रकथाएं भी दी जानी चाहिए। इनमें न केवल शब्दों में बल्कि चित्रों में भी कहानी मिलती है। जिन बच्चों को अभी पढ़ना नहीं आता है वे भी चित्रकथाओं के जरिए किताबों से जुड़ सकते हैं। अब तो शुरुआती पाठकों के लिए शब्दरहित किताबें भी उपलब्ध हैं। असल जरूरत अच्छी किताबों की पहचान करने और उन्हें बच्चों की पहुंच में लाने की है। अभिभावक उनके लिए पुस्तकें तो लाएं ही, उन्हें भी प्रोत्साहित करें कि वे अपनी पॉकेटमनी का एक हिस्सा पुस्तकें और पत्रिकाएं ख़रीदने में लगाएं।
तकनीकी कारण...
पुस्तकों से दोस्ती बच्चों में धैर्य और फोकस बढ़ाती है। विशेषज्ञ यहां तक मानते हैं कि कोर्स से इतर किताबें पढ़ने का यह लाभ उनकी स्कूली पढाई को भी बेहतर बना सकता है
कैसे बनेगी पठन संस्कृति ?
घर में पुस्तकों की सुलभता भी बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। क्या आपके घर में किताबों का कोई कोना है ? जरूरी नहीं कि सैकड़ों किताबों के साथ ही आपका पुस्तकालय तैयार होगा। आप दस-बीस किताबों और पत्रिकाओं से भी अपना घरेलू पुस्तकालय बना सकते हैं। अख़बारों के साथ आने वाली पत्रिकाओं में भी बच्चों के लिए सामग्री होती है। आप पुस्तकालय में इन्हें भी रख सकते हैं। बहरहाल, अपने पुस्तकालय में सामग्री की विविधता का ख़ास ख़याल रखने की ज़रूरत है। यानी वहां विविध विषयों की किताबें होनी चाहिए।
भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता है- 'कुछ लिख के सो, कुछ पढ़ के सो, तू जिस जगह जागा सवेरे, उस जगह से कुछ बढ़ के सो...।' आज के दौर में इसका अमल यह हो सकता है। कि रात में सोने से पहले बच्चों सहित हर सदस्य मोबाइल, लैपटॉप, टीवी से अलग हटकर किताब या पत्रिका के कुछ पृष्ठ पढ़कर ही सोए।